प्रदेश के 85 वर्षीय ओम प्रकाश शर्मा को देश में माच लोक रंगमंच के लिए मिला पद्मश्री

केंद्र सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा गुरूवार को की गई। इन पुरस्कारों में कई हस्तियों को पद्म विभूषण, कई को पद्मभूषण तो कई को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। जिन्हें सम्मानित किया गया उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो अब हमारे बीच नहीं है। मध्य प्रदेश के हिस्से भी ये गौरव आया है और सम्मानित हस्तियों में एक नाम है उज्जैन के ओम प्रकाश शर्मा का। इन्हें माच नृत्य और गायन के उनके 70 साल से भी लंबे और यादगार योगदान के लिए सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। 85 वर्षीय ओम प्रकाश शर्मा 200 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत को अमिट धरोहर के रूप में संजोए हुए हैं।

वर्ष 1938 में उज्जैन में जन्मे ओमप्रकाश शर्मा को यदि भारत में माच लोक रंगमंच का का चेहरा कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। गौर करने की बात यह है कि वे न केवल थिएटर के लिए नाटक लिखते थे, बल्कि उनका संगीत भी खुद ही देते थे। शर्मा जी ने मालवीय भाषा में माच के लिए 16 से ज्यादा नाटक लिखे हैं।

भोपाल का भारत भवन हो या दिल्ली का नेशनल स्कूल आफ ड्रामा, ओम प्रकाश शर्मा के कई शिष्य अलग अलग प्रतिष्ठित स्थानों पर मिल जाएंगे। एक गुरु के रूप में इन्होने अनेक विद्यार्थियों को तैयार किया है। उज्जैन के कालिदास फेस्टिवल में उनके द्वारा माच के रूप में प्रस्तुत किया गया ‘हाथ से चूड़ामणि’ नाटक उनकी प्रसिद्धि का एक बहुत बड़ा कारण बना।

उन्होंने उज्जैन की कालिदास अकादमी में कई संस्कृत के नाटक भी तैयार किए। इसके अलावा संस्कृत गीतों की कैसेट तदैव गंगनम सैव धारा भी उनके द्वारा ही तैयार की गई है। कला के क्षेत्र में उनके इस अविस्मरणीय योगदान के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें शिखर सम्मान और संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

ओम प्रकाश शर्मा ने माच और शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग काफी छोटी उम्र से ही शुरू कर दी थी। उन्हें ये कलाएं उनके पिता शालिग्राम शर्मा ने सिखाई। शर्मा के दादा कालूराम शर्मा ने मालवी भाषा में 22 से ज्यादा नाटक लिखे है और वे उन्हें ही अपना गुरु मानते हैं।

माच शब्द हिंदी के मंच शब्द से आया है। इस विधा का प्रदर्शन ज्यादातर होली के समय लोगों के मनोरंजन के लिए किया जाता था। लोगों का मानना है कि इसकी शुरुआत लगभग 200 साल पहले उज्जैन में गोपाल गुरुद्वारा की गई थी। इसके बाद उस्ताद कालूराम जो दौलतगंज अखाड़े के थे और उस्ताद बालमुकुंद जयसिंहपुरा अखाड़े, ने इस कला को मिलकर आगे बढ़ाया। ओम प्रकाश शर्मा कालूराम अखाड़े से आते हैं।

पहले इस नाटक का प्रस्तुतिकरण फागुन के महीने में किया जाता था जब हवाएं दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हैं। कलाकार उत्तर की ओर मुख कर नाटक प्रस्तुत करते थे, जिससे उसकी आवाज़ दक्षिण ने बहकर ज्यादा दूर तक जा सके। कोटक में इस नाटक में इस्तेमाल होने वाली ढोलक भी सामान्य ढोलक से बड़े होते थे, जिससे उनसे अधिक ध्वनि निकलती थी।

पहले माच नाटक में ज्यादातर पुरुष ही भाग लेते थे लेकिन समय के साथ इसमें भी परिवर्तन हुआ है। बात करें माच में इस्तेमाल होने वाले राग और ताल की तो इसमें जैजवंती, पीलू, भैरवी, असावरी और खमज का ज्यादातर इस्तेमाल किया जाता है। वहीं ताल की बात करें तो रूपचांदी, खेरवा, रूपक और दादरा आदि का इस्तेमाल होता है। उल्लेखनीय बात ये कि ओम प्रकाश शर्मा ने विख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के प्रसिद्ध व्यंग्य भोलाराम के जीव को भी माच कला में तब्दील कर प्रस्तुत किया है।

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